ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री रिवालसर साहिब। यह स्थान साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज जी का ऐतिहासिक स्थान है। जब औरंगजेब हिंदुस्तान पर जुल्म अत्याचार कर रहा था तब औरंगजेब ने 22 धार के पहाड़ी राजाओं को कहा कि अगर आप गुरु गोबिंद सिंह को जिंदा या मुर्दा पड़कर मेरे हवाले कर दोगे तो आपकी सभी रियासतें हमेशा के लिए आजाद कर दूंगा जो टैक्स लेता हूं वह भी माफ कर दूंगा। पहाड़ी राजाओं ने गुरु गोबिंद सिंह जी को इस स्थान पर धोखे से बुलाया बिलासपुर के राजा भीमचंद के वजीर परमानंद पम्मा के द्वारा श्री आनंदपुर साहिब में संदेश भेजा कि हमारे पहाड़ों में एक ऐसा स्थान है जहां पर हर साल बैसाखी का मेला लगता है ।आप भी आओ दर्शन दो हम आपस में बैठकर विचार विमर्श करेंगे औरंगजेब से टक्कर लेने के लिए । राजाओं ने सोचा था कि गुरु गोबिंद सिंह जी अकेले आएंगे या पांच सात सिंह साथ में होंगे हम आसानी से कैद करके औरंगजेब के हवाले कर देंगे। गुरु साहिब ने आना स्वीकार कर लिया । 1701 की बैसाखी वाले दिन समेत परिवार 500 सिंह घुड़सवार तैयार बर तैयार साथ लेकर रिवालसर साहिब पहुंचे जब पहाड़ी राजाओं ने देखा की गुरु गोबिंद सिंह जी तो पूरे लाव लश्कर सहित पहुंचे हैं तो कई राजे भागने लगे। तब गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा कि जिस काम के लिए आपने हमें बुलाया था आओ हम आपस में बैठकर औरंगजेब के विरुद्ध टक्कर लेने के लिए सलाह मशवरा करते हैं। और गुरु साहिब ने अमृत का बाटा भी तैयार किया और राजाओं को कहा कि इसमें इतनी ताकत है कि आप अकेले-अकेले सवा- सवा लाख के साथ टाकरा कर सकते हो राजे कहने लगे कि हम ऊंची जाति के राजपूत राजे हैं हम नीचे जाति के लोगों के साथ बैठकर अमृत नहीं छक्क सकते अगर हमारे लिए अलग बाटा तैयार करोगे तब ही अमृत छकेंगे । गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा हमारा मिशन तो जात पात के भेदभाव को खत्म करके एक संगत एक पंगत का है।
जिसको अमृत छकना छके नहीं छकना ना छके।
गुरु साहिब जी ने वचन किये
इन गरीब सीखन को देहु पातशाही
यह याद रखे हमरी गुरियाई
यहां पर जितने भी राजे एकत्रित थे उनमें से कुछ एक राजे पहले से ही गुरु घर के श्रद्धालु थे जिनमें मंडी का राजा चंबे का राजा व नाहन का राजा इत्यादि शामिल थे जिनमें मंडी के राजे का परिवार तीसरी पातशाही श्री गुरु अमरदास जी महाराज के समय से ही गुरु घर का श्रद्धालु रहा है। श्री गुरु अमरदास महाराज जी के समय में गुरु साहिब के परमसेवक भाई सावन मल जी हुए जो की धर्म प्रचार के लिए मंडी आए थे । उनका इतिहास पंजाब में बुडलाडा के गांव सैदेवाला में स्थित गुरुद्वारा सच निसच के साथ जुड़ता है। और गुरु अर्जन देव महाराज के समय में भाई कल्याणा जी हुए वह भी जब दरबार साहब की सेवा चल रही थी तो मंडी से लक्कड़ लेने के लिए पहुंचे थे उनका इतिहास दरबार साहब के साथ ही लगते
गुरुद्वारा गुरु का बाग के साथ जुड़ता है जहां की गुरु साहब ने मंडी के राजा का जन्म स्वप्न में ही काट दिया था । इस वजह से मंडी के राजा का परिवार पहले से ही गुरु घर का श्रद्धालु था ।यह स्थान भी मंडी वाले राजा सिद्ध सेन के राज्य में ही आता था तो राजा सिद्ध सेन ने गुरु साहिब के यहां पहुंचने पर अच्छी सेवा,आव भगत की। चंबे के राजा की बेटी जिसका नाम इतिहास में पद्मावती बताया गया है वह बहुत विद्वान हुई है जिसको अपनी विद्या पर अहंकार था अपने से आगे किसी भी को नहीं मानती थी कि उससे बड़ा कोई विद्वान होगा।उसने भी अपने पिता सेआज्ञा ली की मैंने भी गुरु साहब के दर्शन करने हैं पर मैं एक सवाल पूछूंगी अगर उस सवाल का जवाब गुरु साहिब दे देंगे तो मैं समझूंगी कि यह पूर्ण सतगुरु है। उसने फारसी की चंद लाइने कविता रूप में लिख कर अपनी दासी के हाथ में गुरु साहिब जी को भेजी। जिसका जवाब गुर साहिब ने उसी वक्त उसी के हाथों में वापस भेज दिया जब जवाब सुनकर राजकुमारी पद्मावती संतुष्ट हो गई। तो गुरु साहिब के चरणों में आकर गिर पड़ी और विनती की कि मुझे भी अमृत छकाओ फिर उसको गुरु साहिब ने अमृत छकाया और उसका नाम पद्मावती से अमृत कौर रखा गया। गुरु साहिब एक महीना यहां पर रुके तकरीबन 32 दिन का समय यहां पर व्यतीत किया। और यह स्थान तीन धर्मों का सांझा स्थान है। सिख धर्म बुद्ध धर्म और हिंदू धर्म। यहां पर हिंदू धर्म के ब्रह्मा के पुत्र लोमस ऋषि जी का भी तपस्थान है। और बुद्ध धर्म के महात्मा बुद्ध के बाद गुरु पदमसंभव हुए इनका भी तप स्थान है। तीन धर्मों का सांझा स्थान होने के कारण इसे त्रिवेणी भी कहते हैं। यहां पर एक ऐतिहासिक झील भी स्थित है इसके बारे में कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि इसमें पत्थर तैरते थे पत्थर तो नहीं तैरते थे लेकिन इसमें छोटे-छोटे टापू जैसे बने हुए थे। जो की हवा के झोंके के साथ आर पार तैरते रहते थे जो कि अब धीरे-धीरे खत्म हो चुके हैं। शिकंद पुराण के अनुसार इस जगह का नाम पहले हृदयेश्वर था और रिवालसर साहिब गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी के आने के बाद पड़ा। जब गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज यहां पर आए उस वक्त यहां पर दो कबीले बसते थे एक ऋषि मुनियों का एक यक्षों का (राक्षसों का) जो राक्षसों का सरदार था उसका नाम कुबेर था ।जब भी ऋषि मुनि होम यज्ञ तप करते थे। तो वह संपूर्ण नहीं होने देता था बीच में विघ्न डालता था उससे सभी परेशान थे तब ऋषि मुनियों ने गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी के चरणों में फरियाद की कि हमें इससे मुक्ति दिलाओ तब गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी ने अपने पांच सिंह उसे बुलाने के लिए भेजें। और उसने आने से इनकार कर दिया और कहा की जिसे मुझे मिलने की जरूरत है खुद आकर मिले उस वक्त गुरु साहिब जिस स्थान पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज जी का प्रकाश है वहां पर एक पत्थर की शीला थी जिस पर गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज विराजमान थे । वहां बैठे-बैठे ही अपने धनुष पर तीर चढ़ाया, अभी चलाया नहीं था उस वक्त ऐसा कौतुक हुआ की पहाड़ियों से बहुत भयंकर गर्जना की आवाज हुई ऐसा प्रतीत हुआ जैसे धरती पलट गई जब कुबेर ने देखा कि यह तो कोई अवतारी पुरुष है तो आकर के गुरु गोबिंद सिंह महाराज के चरणों में गिर पड़ा और विनती की की मेरे पास 10000 डरावनी राक्षस फौज है अगर आपको जरूरत है तो अपनी फौज में शामिल कर लो जंगो युद्धों में काम आएगी। और मेरा उधार करो तब गुरु गोबिंद सिंह महाराज ने वचन किया कि तू भी गुप्त रहे अपनी फौज को भी गुप्त रख अभी समय नहीं है किसी को डराना सताना नहीं जब समय आएगी तेरी फौज से सेवा लेंगे तेरी सेवा प्रवाण होगी। सतयुग में एक ऋषि हुआ उसका नाम रिवाल था उसका राज्य उसके शरीके ने जंग युद्ध करके उससे छीन लिया जब उसका राज भाग छीन गया तो वह दुखी रहने लगा उसकी माता का नाम रेवा था रेवा ने उसको इस स्थान पर तप करने के लिए भेजा। और कहा की कलयुग में कोई अवतारी पुरुष आयेगा जो तेरा उधर करेगा । रिवाल ऋषि की इतनी भक्ति हो गई थी कि वह एक इच्छाधारी सांप बन गया था जो कि जहां मर्जी जब मर्जी अपना रूप बदलकर घूमता फिरता रहता था । रिवाल ऋषि ने भी गुरु गोबिंद सिंह महाराज के चरणों में नमस्कार की और विनती की की मेरे पास 96 करोड़ सांपों की फौज है (जिसको की भुजंग सेना भी लिखा गया है और जो 96 करोड़ खालसा प्रकट होगा वह भी इस स्थान पर गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी के वचन है)अगर आपको जरूरत है तो अपनी फौज में शामिल कर लो जंगो युद्धों में काम आएगी। तब गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज जी ने उसे भी यही वचन किया कि तू भी गुप्त रह अपनी फौज को भी गुप्त रख। अभी समय नहीं है समय आएगा इतना घोर कलयुग बरतेगा किसी किस्म के कोई साक सम्बन्ध नहीं रहेंगे, मंदिरों में बैठकर पुजारी शराब पियेंगे मीट खाएंगे घर-घर कंजरी नाचेगी। तब दुनिया का खात्मा होगा जिसमें 9 नेजे पानी धरती में आएगा एक नेजा 9 फुट का होता है। मतलब 81 फुट पानी धरती में आएगा जिससे दुनिया का खात्मा होगा जिसमें कहा गया है कि माझा मलीया दोआबा दलिया यानी माझा मलीया मलेट हो जाएगा दोआबा दलिये की तरह पीसा जाएगा उस वक्त रिवालसर साहिब की धरती को गुरु साहिब का वर है। 12 कोस पर दिया जलेगा जिसकी लौ में कोई गुरु का प्यारा सिख जिसने भजन बंदगी की होगी उसे ही उस भयानक समय का पता लगेगा जो की बचेगा और रिवाल ऋषि को गुरु साहिब जी ने वर दिया की जा तुझे ऐसा राज देकर जा रहे हैं जो रहती दुनिया में तेरे नाम से रहेगा रिवाल ऋषि का नाम था और सर सरोवर को कहते हैं जो की सरोवर के किनारे बैठकर तप किया करता था उसी के नाम से स्थान का नाम रिवालसर रखा गया।
1महीना यहां रुकने के बाद गुरु साहिब मण्डी चले गए। मण्डी वाले राजा सिद्ध सेन ने एक सुन्दर पालकी तैयार करवाई। पालकी में गुरु साहिब को बैठाकर अपने पुत्रों समेत पालकी को कंधा देकर मण्डी ले गया। इतिहास के मुताबिक पूरे रास्ते में पालकी का वजन उनके कंधों पर नहीं आया। 6 महीने 18 दिन गुरु साहिब मण्डी रुके। 6 महीने 18 दिन मंडी रुकने के बाद जब गुरु साहिब आनंदपुर साहिब वापिस जाने लगे तब मंडी वाला राजा सिद्ध सेन गुरु साहिब जी को लेकर रिवालसर साहिब से 16 किलोमीटर दूर गुरुद्वारा गुरुकोठा साहिब जहां पर राजा सिद्ध सेन का किला था जिसका नाम सिद्ध कोट था। वहां तक अपने परिवार समेत गुरु साहिब को विदा करने के लिए आया और गुरु साहिब जी को विनती की कि मेरे मन की इच्छा है मैं आप जी के नाम से किला बनाना चाहता हूं जिसका नींव पत्थर आप अपने हाथों से रखो। राजा सिद्ध सैन ने अपने किले के साथ एक और किले का निर्माण करवाया जिसका नींव पत्थर गुरु साहिब ने अपने कर कमलों द्वारा रखा और इसका नाम गोबिंदगढ़ रखा और गुरु साहिब ने सिद्ध सेन को कहा कि अपने मन में अहंकार नहीं करना कि मैंने गुरु साहिब जी के नाम से किला बनवाया है इसको मेरे सिंह आकर फतह करेंगे और इस किले को बाबा बंदा बहादुर ने फतह किया जहां पर गुरुद्वारा साहिब बनकर सुशोभित है । वहां पर गुरु साहिब ने पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम किया था और किला साहिब ऊपर पहाड़ी के ऊपर था जो कि अब खंडहर के रूप में है सिर्फ निशान साहिब झूल रहा है। वहां से गुरु साहिब नादौन होते हुए श्री आनंदपुर साहिब वापस चले गए । और 1928 में महाराजा कपूरथला की बेटी महारानी अमृत कौर जो कि केंद्र की पहली स्वास्थ्य मंत्री रही है उसकी शादी मंडी के राजा जोगेंद्र सेन से हुई। शादी के बाद महारानी अमृत कौर ने जब इस स्थान के दर्शन किए तो यहां पर उस वक्त गुरुद्वारा साहिब नहीं था। सिर्फ थड़ा साहब था जहां पर संगते आकर नमस्कार करती थी। महारानी अमृत कौर ने अपनी इच्छा जाहिर की क्यों न यहां पर गुरुद्वारा साहिब बनाया जाए। फिर महारानी अमृत कौर ने श्री दरबार साहिब अमृतसर साहिब का नक्शा मंगवाकर उस नक्शे के मुताबिक गुरुद्वारा साहिब का निर्माण करवाया जिसकी 1928 में सेवा आरम्भ हुई और 1930 में संपूर्ण हुई 1930 की बैसाखी वाले दिन श्री दरबार साहिब अमृतसर साहिब से श्री गुरु ग्रंथ साहिब महाराज जी का पावन स्वरूप नगर कीर्तन रूप में लाकर यहां पर पहला प्रकाश किया गया उस वक्त जो हुक्मनामा आया
सुही महला 5
संता के कारज आप खलोया हर कम करावन आया राम
धरत सुहावी ताल सुहावा विच अमृत जल छाया राम
1982 में श्रीमान संत बाबा लाभ सिंह जी किला आनंदगढ़ साहिब श्री आनंदपुर साहिब कार सेवा वाले महापुरुषों ने इस स्थान की सेवा संभाली और 2025 तक निरंतर सेवाएं निभाई अब इस स्थान की सेवा सम्भाल इस इलाके की गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ऐतिहासिक गुरुद्वारा रिवालसर साहिब, ऐतिहासिक गुरुद्वारा गुरुकोठा साहिब , श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारा साहिब नेर चौक साहिब के प्रबन्ध अधीन है। इस स्थान पर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज जी के समय की ऐतिहासिक पुरातन बाउली साहिब भी संगत के दर्शनों के लिए सुशोभित है। 24 घंटे लंगर रिहायश का पूरा प्रबन्ध है।